आगाज होता है मगर,अंजाम नही होता,
मेरी सफर का जब तू,मुकाम नही होता,
रूठ कर ,टूट जाता है आइना मेरा,
किसी चेहरे में जो तेरा,दीदार नही होता।
सहर होती है मगर,शाम नही होता,
किसी पहर जो तेरा,पैगाम नही होता,
कुछ शबनम सा छा जाता है,निगाहों में मेरी,
मेरी नज़र में जो तेरा ,निशाँ नही होता।
कोई नज़्म नही बनती,कोई शेर नही होता,
मेरी गजलों का जब तू ,तस्व्वुर नही होता,
बुझा-बुझा सा रहता है,उस रात का चाँद,
जिस चान्द में तेरा,नूर नही होता।
बेचैन धड़कन,खामोश दिल,
साथ होता है मगर ,सुकून नही होता,
कुछ सहम सी जाती हैं,साँसें मेरी,
मेरी धड़कन को जो तेरा,फितूर नही होता।
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