मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे...



मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे,
इतना प्यार कर, कि हद्द कर दे,
चाहे कितना भी रोके ये, काफ़िर ज़माना,
तेरा इश्क़, मेरे नाम हमदम कर दे

कि शबनम भी अब चिंगारी सी लगती है,
हर पल धड़कन में, बेकरारी सी रहती है,
कि बाँध के अपने ,आँचल से यारा,
अपनी बाहों के जेल में, कैद कर ले,
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे

यूँ  तो प्यार का हर शब्द ,अधूरा होता है,
कौन सा जिस्म, रूह बिना पूरा होता है,
मै भी अकेला, इस भीड़ की बस्ती में,
थाम के "प्यार" से, दामन मेरा,
ये हथेली मेरी मुक़म्मल कर दे,
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे

जानता हूँ,मै पागल, एक गुनाह कर बैठा हूँ,
बेखयाली में यूँ ही, इकरार कर बैठा हूँ,
इस जमीन पर, तो टूटा सितारा भी नहीं गिरता
और मै पागल, चाँद से प्यार कर बैठा हूँ
फिर भी, हो सके तो, बरसा कर नूर अपनी चाँदनी का,
ये रात मेरी मुकम्मल कर दे,
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे

माना ,वक़्त की आदत बड़ी बुरी है,
हर वक़्त, बेवक़्त ही गुज़र जायेगा,
जो अब तक, तेरे साथ गुज़रा था कल, कल, तेरे बाद भी गुज़र जायेगा,
कि थाम के इन लम्हों को
धड़कन में महफूज़ कर ले, 
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे.

बेशक, दिल भी एक "दीया"होता है,
जो गैरों के इश्क़ में, जला करता है,
एक मेरे सीने में भी, चिराग़ है जानम,
जो जूगनु की तरह, जिया करता है,
की बिखर के, सूरज की धूप सा, ये सवेरा मेरा मुकम्मल कर दे,
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे

क़ि,आशिकी में तेरी, खुद को बदनाम कर बैठा हूँ,
यादों को तेरी, कायनात कर बैठा हूँ,
न जाने कैसी लगी है आग सीने में,
कि चंद लम्हों को पूरा, कारवां कर बैठा हूँ,
कि फैला के अपने इश्क़ की खुशबू, ये साँस मेरी मुकम्मल कर दे,
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे

रेशम बुनने वाले कीड़े, रेशम में ही मर जाते हैं,
टूट कर प्यार करने वाले, प्यार कर के टूट जाते हैं,
फिर भी गिला न मुझको कोई, ग़र तू ये एहसान कर दे,
बरसा कर अपने इश्क़ की बूंदें, ये सहरा दिल गुलज़ार कर दे,
कि तोड़ के अपने लबों की चुप्पी, ये लफ्ज़ मेरे मुक़म्मल कर दे
मेरी नीम सी ज़िन्दगी शहद कर दे

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