छुप-छुप के पढती है,अलफाजो को मेरे


छुप-छुप के पढती है,अलफाजो को मेरे, 

मेरे लफ़्ज़-ए-लबों ,को ख़ामोश करने वाली,

अब एक ख़ास नज़र से,नज़रअंदाज़ करती है मुझको, 

कभी,मेरे आँखो के शबनम मे भीगनेवाली.

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