सोचता हूँ....बिना तेरे ,ये जिंदगी कैसी होगी,
ना खुशियों का बादल होगा, ना गम कि बारीश होगी , ना होगा वो पूनम का चाँद,ना सूरज कि धूप होगी, सोचता हूँ....बिना तेरे ,ये जिंदगी कैसी होगी,
सोचता हूँ....
सोचता हूँ....होगा पतझड़ यूँ ही सदा,या सावन भी आएगा कभी,
ये जो आग लगी है सीने मे,पल मे बुझेगी भी कभी.
सोचता हूँ....
सोचता हूँ....क्या तू कभी,मेरा हबीब होगा ?
या होगा,तेरी यादों का समंदर और उसमे डूबना ,मेरा नसीब होगा
सोचता हूँ....
सोचता हूँ....क्या मेरी हर धड़कन तेरे दिल के करीब होगी?
या होगा एहसास आखिरी पल का,और मौत मेरे करीब होगी।
सोचता हूँ....
सोचता हूँ....क्या जिंदगी यूँ भी कभी होगी,
मेरा हर गम तेरा होगा,तेरी हर खुशी मेरी होगी।
सोचता हूँ....
सोचता हूँ.... ये जो महफिल है ,मेरी मोहब्बत का,
कभी इसमे तेरा भी कारवाँ होगा,
बात मेरी होगी,होंठ तेरे होंगे, और ,इश्क तेरा भी मुझपे मँहरबा होगा।
सोचता हूँ....
बस.......
सोचता हूँ....
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