मंज़िल नज़र से दूर पर ,रास्ते को जीना सिख लिया,
मोहब्बत तो अब ख्वाईश सी रही,नफरत में जीना सीख लिया।
ज़ख्म की तो आदत सी ठहरी, आदत में रहना सिख लिया,
दर्द ही सच्चा यार है,यारी में रहना सिख लिया।
जब देखा गुल - गुलज़ार का,गुलों का सपना देख लिया,
फिर देखा गुल - गुलाब का,काँटों में रहना सिख लिया।
देखा जो मंज़र मोती का,नज़र-नज़र ने जान लिया,
आँखों में डूबना बेकार है,लहरों में डूबना सिख लिया।
2 पल की फितरत वक्त की,सो पल-पल को जीना सीख लिया,
खैर करे क्या दिल की कोई,धड़कन में जीना सीख लिया।
फूलों की जवानी डाली तक,मंदिर में रहकर देख लिया,
खुशबू ही रवानी फूलों की फिर,ख़ुशबू सा जीना सीख लिया।
मोहब्बत जब खुद्दार हुई, खुद को जीना भूल गया,
अब देखा मंज़र इश्क़ का,सो खुद को जीना सीख लिया।
जगह न दे जब नज़र किसी की,तस्वीर में जीना सीख लिया,
होश ने लूटा जब सब-कुछ अपना,मदहोशी में रहना सिख लिया।
पहले थी कुछ ऐसी हसरत,कि ज़िन्दगी गुलों सी गुलज़ार हो जाये,
फिर देखा जो मँदिर में रहकर,पत्थर सा रहना सिख लिया।
सूरज की धूप खलने लगी तो ,जुगनू सा जलना सीख लिया
रूह बेआबरु हो चुकी,साए में जीना सीख लिया।
जहाँ कहना अब बेकार ठहरा,वहां सुनने का शौक पाल लिया,
शब्द जब नाचीज़ ठहरे, खोमोशी में जीना सीख लिया।
Vocabulary:
1.गुलज़ार-Garden of flowers
2.नाचीज़-Nothing
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