हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता

हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता,
किसी को ज़मीं  नही मिलती, किसी को आसमाँ नही मिलता,

कुछ इसी तरह है मोहब्बत कि दास्ताँ भी,
जन्नत की ज़मीं कभी, कभी जहन्नुम के जहाँ सी,
ज़ुबाँ तो मिली है सभी को मगर.., हमज़ुबाँ नही मिलता,​
हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता,.

१०० ज़ख्म है दिखाने को, १०० ज़ख्म है छिपाने को,
बिन कहे कोई समझाए कैसे ,जो राज है दिल मे बतलाने को,
कभी दुअi नही मिलती, कभी लब्स नही मिलता​,
हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता..

जाने ,कोई इस कदर भी इश्क़ क्यूँ करता है…?
जो नही है उसका वही खोने से डरता है,
पागल दिल को कोई समझाऐ कैसे …?
किचड़ की ज़मीं पऱ गुलाब नही खिलता​..
हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता

दिवाने दिल का ऐतबार क्या करना
हो जाये इश्क़ तो इन्तजार क्या करना
कभी दिल नही मिलते ,कभी दिलदार नही मिलता​..
हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता..

हो दीवानगी जुनून पर,
तो कभी चैन नही मिलता,कभी करार नहीं मिलता..
तड़पाए इस कदर ये इश्क़ किसी की वफ़ा मे,
कभी ज़िंदगी नही मिलती ,कभी मौत नही मिलता..
हर किसी तो मुकम्मल जहाँ नही मिलता.

सच है इश्क़ मे तन्हाई साथ चलती है..,
टूटे दिल के समंदर में, यादो की कश्ती साथ चलती है,
कोई बेखुद है किसी की खुदी मे इतना …
की खुदी को खुदा नही मिलता..
हर किसी तो मुकम्मल जहाँ नही मिलता.

सच्चे इश्क़ का अंज़ाम अक्सर यही होता है…
जिसने प्यार को समझा ,वही प्यार मे रोता है,
कहने को तो सारे जहाँ मे इश्क़ फैला है..,
पर, जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नही मिलता..
हर किसी तो मुकम्मल जहाँ नही मिलता.
किसी को ज़मीं नही मिलती, किसी को आसमाँ नही मिलता.

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